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Zakhm ishq ka

   ज़ख़्म इश्क का    

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इस जमीन पे जन्नत बसने नही देगी ये दुनिया !
जख्म इश्क का, भरने नही देगी ये दुनिया !
इस जमीन पे.........

यार मेरे मुझको बता, किस तरहां जिये हम ? 
दो दिलो को यहाँ, मिलने नही देगी ये दुनिया !
इस जमीन पे.......

हर शख्स यह कहता है, इश्क सौगाद खुदा की
मगर इन पे अमल करने नही देगी ये दुनिया !
इस जमीन पे........

ये जुदाई का गम, हमे मार डाले गए जुरूर !
ख़ुद को कैसे संभाले, संभल ने नही देगी ये दुनिया!
इस जमीन पे........

ताज बनाया शाहजहाँ ने, सिर्फ मुमताज के लीये !
कब्र में भी "जगाणी" सुकुन लेने नही देगी ये दुनिया
इस जमीन पे.......



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